Friday, 6 February 2015

कितनी जंग लड़े हर रोज़.......

पिछले कई दिनों से सुबह अख़बार उठाते ही जो पहली खबर अपनी ओर ध्यान खींचती वो होती स्वाइन फ़्लू का कहर जो अब हमारे प्रदेश, हमारे अपने शहर में दस्तक दे चुका था। हर रोज़ मरने वालों और नए H1N1 पॉजिटिव की संख्या बढ़ती ही जा रही है जैसे कोई होड़ लगी हो और ये फ्लू सभी को अपनी चपेट में लेकर ही मानेगा। शहर के अस्पतालों में डॉक्टर्स और मरीजों दोनों के हाल ख़राब थे जरा सा जुकाम होता और सब सीधा अस्पताल का रुख करते , दवाइयाँ काम पड़ रहीं थी, वैक्सींस खत्म हो गए और डर बढ़ता ही जा रहा था। इससे पहले भी कई बार ये कहर बरस चुका है पर हमारे शहर में ऐसा पहली बार हो रहा था तो डर और मिथ दोनों ही ज्यादा थे।
कपूर और ईलायची सूँघो…….
आयुर्वेदिक काढ़ा पियो……..
तुलसी के पत्ते चबाओ……..
किसी से हाथ ना मिलाओ……..


शादी यां मौत पर मत जाओ……..
नीम के पत्ते घर में लटकाओ…………
कोई जुकाम वाला घर आ जाये तो उसे तुरंत भेज दो......
घर का कोना कोना साफ करो ……
अंतहीन हिदायतें .........
हाल ये हुआ कि मिर्च के छौंक से भी किसी को छींक आती तो दिल बैठ जाता। घर दिन में कई बार डेटोल फिनाइल से साफ किया जाने लगा, बाहर आना जाना कम हो गया ……
सोचती हूँ इस फ़्लू को क्या पड़ी थी हमारे देश में आने की क्या वैसे ही जान की आफ़ते यहाँ कम है?आतंकवाद, भ्रष्टाचार, ग्लोबल वार्मिंग तो खेर बहुत बड़ी बड़ी बातें है..... यहाँ तो रोड पर चलो तो सरफिरे ड्राइवर्स जो खुदको और हमें मारने की सुपारी लेकर ही घर से निकलते है उनसे भी खतरा... दो वक़्त की रोटी में भी ज़माने भर की मिलावट का खतरा। दूध पीते है तो ना चाहते हुए भी कपड़े धोने के सर्फ और साबुन की महक आ जाती है, और उसपर हमारी लाइफस्टाइल तो खेर बोनस है ही ....
आपके मेरे जैसा आम इंसान आखिर हर रोज़ कितनी जंग लड़ेगा? एक एक सांस के लिए जंग, एक सच्ची मुस्कराहट के लिए जंग, चिंता मुक्त एक नींद के लिए जंग.... 
और अब इस मरे स्वाइन फ़्लू से भी जंग.....
हाय ……
आज सुबह से जुकाम था इसलिए सोचा जल्दी जल्दी अपने मन की बात तो लिख दूँ, पर कुछ ज्यादा ही लिख दिया, वैसे दो अदरक वाली चाय से जुकाम जैसे आया था वैसे ही चला भी गया। 
शायद आज भर की जंग तो मैंने जीत ही ली है ...... :-)

Thursday, 15 January 2015

एक ख्याल

आज सुबह जब आँख खुली तो यूँ ही एक ख्याल आया कि पूरी दुनियां में कितने ऐसे लोग होंगे जो आज का सवेरा नहीं देख पाये होंगे ।
रात के दामन में हॉस्पिटल के बेड पर किसी सामान की तरह पड़े पड़े यां घर में परिवार से घिरे अपने अंदर उठती किसी अजीब सी तकलीफ से अकेले लड़ते हुए जिन्होंने अपनी आखरी सांस ली होगी । शायद काले साये उन्हें ले गए होंगे यां रौशनी के चमकते टुकड़े ने उन्हें अपनी तरफ खींचा होगा, कौन जाने? जो गए तो कितनी ही कहानियां अधूरी छोड़ गए, कितनी ही बातें अनकही रह गई, कितने ही ख्वाब कभी मुकमल ही नहीं हुए। 
फिर भी अँधेरी रात के बाद फिर चमकती सुबह हुई और इस सुबह में हम जैसे करोड़ों अरबों लोगों ने आँखे खोलीं हैं । तो क्या हमें शुक्रिया अदा नही करना चाहिए ? हम वो खुशनसीब लोग हैं जिन्हें फिर से ये खूबसूरत दिन नसीब हुआ है कितनी ही अधूरी कहानियों, अनकही बातों और ख़्वाबों को मुक्कमल करने का एक और मौका मिला है ।

Tuesday, 23 December 2014

एक बेनाम बस्ती

शहर के सबसे पॉश इलाके में बने आलिशान मॉल के पास खाली पड़ी सरकारी ज़मीन पर अवैध तरह से बनी थी वो बेनाम बस्ती। कारीगर रहते थे वहां .... शायद कारीगर कहना ही ठीक होगा उन्हें । साल भर अपने हाथों से कुछ ना कुछ बनाते और पास फुटपाथ पर ही बेचते। कभी तरह तरह के खिलोने तो कभी बेंत की कुर्सियां और मेज़, नवरात्रों में माँ दुर्गा की मूर्तियाँ तो गणेश उत्सव पर गणेश की मूर्तियां । जो भी बनाते उसमें जान फूंक देते । फिर भी ना उन्हें इस शहर में वो सम्मान मिला ना सर पर छत। जहाँ जाते किराये पर घर खरीदने वहीँ से बेइज़्ज़त करके निकाल दिए जाते क्योंकि शहर शहर भटकते थे वो लोग उनका कोई एक ठिकाना नहीं था लिहाज़ा इस तरह सरकारी ज़मीन पर लकड़ियों और बरसाती के सहारे कई झोंपड़ियाँ बन गई और 20-25 झोंपड़ियों ने मिलकर छोटी बस्ती की शक्ल ले ली । बेनाम और अस्तित्वहीन बस्ती जिसे आते-जाते सब हिक़ारत भरी नज़रों से देखते हैं , जैसे वो सब बस कचरे का ढेर हों और कुछ नहीं। उनके बनाये खिलौनों से शहर केे बच्चों का बचपन आबाद हैे , उनकी बनाई मूर्तियों के बिना शहर का कोई भी पंडाल अधूरा रहता । फिर भी वो हैं बस कचरे का ढ़ेर, बेनाम बस्ती में रहने वाले बेनाम लोग । वो बेनाम बस्ती जिसे हमनें ही जन्म दिया है । और अब वो बेनाम लोग हमें आते जाते हिकारत भरी नज़रों से देखते है। शहर के सबसे पॉश इलाके में अपनी बस्ती से ऊँची ऊँची इमारतों को ठेंगा दिखाते है ।

Sunday, 29 June 2014

एक अरसे बाद आज अपने ही ब्लॉग में लिखकर अजीब सी ख़ुशी का अहसास हो रहा है जैसे बहुत दिन दूसरे शहर सेर सपाटा करके घर लौटने पर जो ख़ुशी मिलती है ना बिलकुल वैसी ………
अच्छा लग रहा है अपने इस घर में फिर से लौटकर जहाँ की दीवारें  भी मेरी है और खिड़कियां भी....  और खिड़की के बाहर वो जो चिड़िया बैठी है ना रूठकर वो भी है तो मेरी अपनी ही पर बस अभी ज़रा नाराज है, बहुत दिनों से इसे इस खिड़की पर कोई दाना रखा हुआ जो नहीं मिला और आज दाना पानी सब रखा है तो थोड़े नखरे इसके भी बनते है। 


………… 

Tuesday, 14 January 2014

लघु कथा - (भूख -प्यास )


"10 साल के रघु ने माँ से कहा "माँ बहुत भूख लगी है" माँ बोली बेटा अभी पानी पी ले पेट नहीं दुखेगा, तू फ़िक्र मत कर आज तेरे पिताजी जरुर खाने को कुछ लेकर आयेंगे। 
उधर रघु का बाप रमेश घर लौट रहा था आज उसे 50 रु. मजदूरी भी मिली थी रस्ते में उसे  अपने शराबी दोस्त मिल गए और कहने लगे मजदूरी करके थक गया होगा ना चल ठेके पर चलते है एक-एक थैली पीते है। रमेश भी उनके साथ चल दिया पर तीन लोगो की शराब की प्यास 50 रु से कहाँ बुझ पाती.....
रमेश अपनी प्यास बुझा के घर पहुंचा तो रघु और उसकी माँ पेट पर कपड़ा बांधे 4 दिन के भूखे जमीं पर बेसुध पड़े थे..."

बेबसी



                    शाम गहरा रही थी, मौसम का मिज़ाज़ भी कुछ ठीक नहीं था ऐसा लग रहा था जैसे वो भी नाराज़ हो, दुखी हो और मोका मिलते ही फूट फूट के रोने लगेगा उसे भी दिलासे कि दरकार थी पर कौनसा आसमान उस बिगड़ते मौसम को संभाल सकता था यूँ भी अक्सर बुझे दिल और बेबस हालातो में हम अकेले ही तो होते है....
सोचते सोचते मोहन कुछ देर यूँ ही शून्य में ताकता रहा फिर किसी तरह बेमन से घर जाने का इरादा कर ही लिया, सामान समेटने के लिए अपने सब्जी के ठेले की तरफ मुड़ा, आज फिर ५-६ किलो से ज्यादा सब्जियां नहीं बिक पाई थी, जिस भी गली में जाता सब टोकते "अरे! तू सब्जी बेच रहा है या सोना चांदी इतनी महँगी?" मोहन समझाने कि कोशिश करता "बहन सा महंगाई तो हर चीज़ में बड़ी है फिर मुझे जो भाव में मंडी से सब्जियां पड़ती है मैं बस अपने पेट जितना उसमे जोड़ के बेच देता हूँ, दाम आपको थोड़े ज्यादा लगेंगे पर माल बिलकुल चोखा मिलेगा" तपाक से जवाब मिलता "वाह वाह ! महंगाई तो बस तेरे लिए ही बड़ी है सब जानती हूँ मैं, ये जो नए किराना और सब्जियों के रीटेल दुकान खुले है वहाँ सब्जियां तेरे भाव से आधे भाव पर मिल जाती है वहीँ से लूंगी मैं तो " मन में झुंझुलाहट और आँखों में बेबसी लेकर मोहन आगे बड़ जाता। इन बड़ी बड़ी रीटेल दुकानो ने मोहन जैसे कई छोटे छोटे सब्जियों और फलो के व्यापारियों के पेट पर लात मार दी थी, इन दुकानो में माल सीधा किसानो से आता पर मोहन जैसे व्यापारियों को तो बड़े ठेकेदारो , मंडी में माल पहुँचाने वाले एजेंटों और फिर मंडी के व्यापारियों सभी का सामना करना पड़ता और फिर इतनी गुंजाईश ही नहीं बचती कि वो अपना भी अच्छा मुनाफा जोड़ सकें कम मुनाफे पर बेचने पर भी मोहन का ठेला अक्सर भरा ही घर तक जाता और उसके बच्चे का पेट उस दिन आधा ही भर पाता, आज फिर यही होने वाला था आँखों के किनारे अपनी बेबसी की एक बूंद छिपाते हुए मोहन अपने घर कि तरफ चल दिया।


- लीना गोस्वामी

Friday, 29 November 2013

प्यार का सफ़र

new story.....
story kesi lagi jarur bataiyega....

प्यार का सफ़र

मेरे अनिकेत, 
बहुत कुछ कहना चाहती हूँ तुमसे, कुछ दिल में दबा सा है वो बाँटना चाहती हूँ, सोचा था मिलकर करुँगी सारी दिल की बातें पर फिर ख्याल आया कि तुम तो इतना बोलते हो कि मुझे तो कुछ कहने का मोका ही नहीं दोगे ।

अरे! तुम्हे यकीन नहीं हो रहा अभी कल ही की बात ले लो मैंने तुम्हे रेस्टोरंट में कोफ्फी पीने के लिए इसलिए बुलाया था कि मैं तुमसे कुछ कहना चाहती थी पर ना जाने तुमने कहाँ कहाँ की बातें निकाल ली और कोफ्फी के साथ दो - दो समोसे चट कर जाने तक भी तुम्हारी बातें जब ख़त्म नहीं हुई तो मजबूरन मुझे अपनी बातों की पोटली फिर से लाद कर घर आना पड़ा था। इसलिए आज नो रिस्क अब मैं तुम्हें लिखकर दूंगी ताकि फिर से तुम्हारी बक बक में, मेरी बातें अधूरी न रह जाएँ ।

चलो आज शुरू से शुरू करती हूँ। मुझे कॉलेज में आये अभी 5-6 दिन ही हुए थे जब नम्रता तुम्हारी क्लासमेट और मेरी पड़ोसन ने मुझे तुमसे मिलवाया था। यूँ तो वो मुलाकात बहुत फॉर्मल थी पर शायद उस दिन मैं जितने भी नए चेहरों से मिली थी उसमे से घर जाने के बाद मुझे बस तुम्हारा ही चेहरा कुछ कुछ याद था।
कुछ ही दिनों में हमारा बड़ा सा ग्रुप बन गया, साथ बैठे घंटों गप्पे लगाना, साथ खाना, घूमना, बेतुकी बातो पे बड़ी बड़ी शर्त लगा लेना और दिन भर एक दुसरे की खिंचाई करके ठहाके लगाना जैसे दिन की एक अहम् खुराक सी बन गई थी। तब ही से 20 लोगो के हमारे ग्रुप में मुझे तुमसे बात करना ज्यादा अच्छा लगता था, घर आकर भी मैं तुम्हारे फालतू जोक्स पर मुस्कुराया करती थी, बहुत जल्दी हम दोनों काफी अच्छे दोस्त बन गए थे, तुम मुझे बाइक पर घर छोड़ने आते मैं तुम्हारे छोटे मोटे कई काम कर लिया करती पर एक बात पर मैंने खुद भी कभी गौर नहीं किया था कि पहले ही दिन से मेरी तुम्हे लेकर फीलिंग्स और बाकि सारे दोस्तों को लेकर जो फीलिंग्स थी उसमे कुछ अंतर था। फिर ना जाने कब तुमने किस बात पर क्या कहा था ये मुझे अनजाने में ही याद रहने लगा, जैसे दिमाग का कोई बाय डिफ़ॉल्ट फंक्शन हो। मैंने महसूस किया था कि जब तुम कहीं आस पास होते तो मैं चुपके से तुम्हे आँखों के किनारों से देखा करती थी। घर आकर भी तुम्हारा ही ख्याल रहता था, जिस दिन तुम कॉलेज नहीं आते सबके होते हुए भी मैं अकेला सा महसूस करती, हर पल जैसे बोझ लगता, तुमसे ही अपने दिल की हर बात कहने का मन करता, उदास होती तब भी निगाहें सिर्फ तुम्हे ही ढूंढ़ती थी।
पर मैं अपने जज्बातों को लगातार नजरंदाज करती रही, हर दिन खुदसे ही लड़ती समझाती कि तुम बस बहुत अच्छे दोस्त हो और ये जो अलग से अहसास है वो बस आकर्षण है और दो चार दिन में ये भूत भी उतर जायेगा ।

एक दिन हम सब यूँ ही कैंटीन में हर रोज़ की तरह चाय की चुस्कियों के साथ इधर उधर की बातों में मशगूल थे, किसी बात पर हँसते हँसते तुमने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया और तुम्हारा हाथ मेरे सूट के गले में लगी डोरी पर चला गया, और ना जाने किस ख्याल में तुमने उसे खोल दिया, जैसे ही तुमने मुझे, फिर अपने हाथ की ओर देखा तो तुम बुरी तरह झेंप गए थे, पर उस दिन पहली बार मैं खुदको ये मानने से रोक नहीं पाई थी कि कहीं न कहीं तुम्हारी उस शरारत का मुझे एक अरसे से इन्तेजार था |

मेरे अनिकेत,
तुम्हे याद है जुलाई महीने का वो दिन….
बहुत तेज बारिश हो रही थी और तुम मुझे हमेशा की तरह घर छोड़ने चले थे, कितना खुबसूरत समां था ना सब कुछ ताजगी में नहाया लग रहा था। एक ओर बच्चे पानी में नाव चलाकर उसके डूबने पर भी खिलखिला रहे थे और कहीं कोई नया जोड़ा एक ही छत्री में आधे गीले आधे सूखे कदम से कदम मिलाकर चलते अपने प्यार की पहली बारिश को यादगार बना रहे थे । हम भी कहने को तो साथ भीग रहे थे, पर दोनों पर जैसे अलग अलग आसमान बरस रहा हो, तुमपर सिर्फ पानी और मुझपे तुम्हारे लिए प्यार के पहले अहसास भी शामिल थे उन बूंदों में, यां शायद तुम पर भी वही अहसासों की बुँदे गिरी हो कौन जाने, मेरे मन में दबे जज्बातों ने फिर से जंग छेड़ दी और इस बार मैं उनसे हार गई। मैं थक गई थी खुदको तुमसे दूर करते करते इस सच से इनकार करते करते की तुम सिर्फ मेरे दोस्त नहीं हो, मैं अब बस उस वक़्त को वहीँ रोक देना चाहती थी, तुम्हारे साथ उस बारिश की हर बूँद के अहसास को अपने मन में बसा लेना चाहती थी तुम्हारे साथ एक ही छत्री के नीचे आधा भीगना चाहती थी, तुम्हारे साथ हमारे प्यार की पहली बारिश में तुमसे कह देना चाहती थी की मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। तुम्हारे साथ कुछ नए सपने देखना चाहती थी, उस आधे घंटे के छोटे से सफ़र में कितना पास आ गई थी मैं तुम्हारे कितनी ही बार मेरे दिल ने कहा कि तुम्हे कस के थाम लूँ कितनी ही बार मैं तुम्हे अपने दिल की बात बस कहते कहते रुक गई थी।
यूँ हमेशा बक बक करने वाले तुमने कभी कहा नहीं था के मैं तुम्हारे लिए हूँ क्या, सिर्फ दोस्त या दोस्त से कुछ ज्यादा या फिर वो जो तुम मेरे लिए बन गए थे। पर बिन कहे सुने भी इतना तो जान लिया था की कुछ तो था तुम्हारे मन में भी, वरना क्यूँ तुम मुझपे हक जमाते, मेरे नाराज होने पर परेशान होते, मुझे मनाने के सारे मुमकिन पेंतरे आजमा लेते। घंटो मुझसे अपने दिल की हर बात कहते और मेरे दिल की बात अक्सर बिन कहे ही समझ लेते |

और उस दिन जब हम सब फिल्म देखने गए थे....
तुमने फिल्म हॉल के अन्धेरें में मेरा हाथ चुपके से पकड़ लिया था और जब मैंने हाथ छुड़वाने की कोशिश की तो तुमने अपना हाथ और कस लिया था, उस पल फिल्म हॉल की वो कई छोटे छोटे बल्बों की क़तार से सजी छत मुझे सितारों से भरा आसमान लग रही थी और हम उस आसमान के नीचे हाथ थामे एक अलग ही भाषा में बात कर रहे थे, स्पर्श की भाषा।
मैं हाथ छुड़वाने लगी तो -
तुमने कहा- “मैंने ये हाथ छोड़ने के लिए नहीं थामा संध्या”
मैंने कहा- “उम्र भर थाम पाओगे?”
तुमने कहा- “अगर तुम साथ दोगी तो”
मैंने जवाब में अपना सर तुम्हारे कंधे पर रख दिया।
हाँ वो प्यार ही था पर उसे बयां करने के लिए शब्दों की दरकार नहीं थी, उसने खुद ही अपनी एक अलग भाषा बना ली थी। कभी आँखे घंटो बातें करती तो दिल ख़ामोशी से सुनता और होंट जवाब में मुस्कुरा देते।

मेरे अनिकेत,
मैंने एक साल में खुदको बहुत बदलते देखा, अपने ही दायरों के पेड़ से मैं एक पत्ते की तरह अलग हो गई थी और तुम हवा की तरह जहाँ बहते, वहीँ मैं भी तुम्हारे साथ बहने लगी थी उड़ने लगी थी जिस भी दिशा तुम ले जाते वो मुझे अपनी सी लगती वहीँ अपना आशियाना बना लेती |
प्यार में ऐसा ही होता है ना दो लोग जाने कब इतना जुड़ जाते है की किसी एक का रास्ता दुसरे की मंजिल बन जाता है, एक की चाहत दुरसे का मकसद । तुम्हारे साथ इस नए सफ़र में मैं इतना खो गयी कि ये भूल ही गयी थी कि दूर से बेहद खुबसूरत लगने वाले इस रास्ते पर कई इम्तेहानो के कांटे भी हमारा इन्तेजार कर रहे थे |
उस दिन तुम कॉलेज नहीं आये थे मैं और नम्रता कॉलेज केन्टीन में बैठे चाय के साथ कुछ असाइनमेंट डिस्कस कर रहे थे तभी सामने से आ रही एक लड़की को देखकर नम्रता ने चहकते हुए कहा "अरे! शेफाली तुम? कब आई दिल्ली से, कितने दिन हो यहाँ"
शेफाली- "परसों रात को ही आई और इस बार पूरे एक हफ्ते की छुट्टी लेकर आई हूँ”
"Oh great !”
फिर नम्रता ने मेरा भी शेफाली के साथ इंट्रोडक्शन करवाया और वो एक बार फिर शेफाली से बात करने में मशगूल हो गई-
"और बताओ तुम्हारा और तुम्हारे हीरो का कैसा चल रहा है ?"
शेफाली बोली- "बहुत अच्छा चल रहा है अभी कल ही तो अनिकेत मुझे फिल्म दिखाने ले गए थे, उसके बाद डिनर फिर लॉन्ग ड्राइव..."
शेफाली बोले जा रही थी पर मेरा दिमाग एक ही शब्द पर अटका हुआ था - 'अनिकेत'
मुझसे रहा नहीं गया और मैं बीच में ही टोकती हुई पूछ बैठी ।
"कौन अनिकेत?”
नम्रता ने जो जवाब दिया उससे एक पल में सब कुछ बदल गया। तुम तो जानते ही हो उसने क्या कहा होगा। उसने कहा -"अरे! अपना अनिकेत, तुम्हारा बेस्ट फ्रेंड, सारा कॉलेज जानता है तुम्हे कैसे नहीं पता शेफाली अनिकेत की गर्लफ्रेंड है"

मेरे अनिकेत,
उस एक पल में जिंदगी ने ऐसे मुंह मोड़ लिया जैसे बरसो की नाराजगी की सजा एक ही बार में दे देना चाहती हो।
हजारो सवाल एक साथ दिमाग में चल रहे थे।
जो रिश्ता मेरे और तुम्हारे बीच था क्या था वो?
क्या कोई रिश्ता था भी हमारे बीच?
जो तुमने आँखों की भाषा में कहा था मुझसे क्या वो तुमने सच में कहा था या वो बस मेरे मन की ही उपज थी अपना दिल बहलाने के लिए?
क्या जो भी मुझे महसूस हुआ वो सब जूठ था ?
क्यूँ आखिर तुमने मुझे शेफाली के बारे में नहीं बताया था?
मेरे पास किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था
कुछ सवालो के जवाब तो तुम जरुर दे पाते पर अब मुझमे ही जवाब सुनने की हिम्मत नहीं थी क्यूंकि सच तो आँखों के सामने ही था | जब अगले दिन तुम आये तो बिलकुल हमेशा की तरह ही मिले यहाँ तक की शेफाली को देखकर भी तुम्हारे चेहरे पर कोई भाव ही नहीं आये, जैसे तुम्हे मेरे और शेफाली के एक ही जगह एक साथ होने से कुछ फरक ही न पड़ता हो।
मुझे गुस्सा आ रहा था खुद पर भी और तुम पर भी क्यों विश्वास किया मैंने तुमपर कई बार जी में आया कि तुमसे बहुत लडूं कि तुमने क्यूँ मुझे शेफाली के बारे में पहले नहीं बताया, क्यूँ मुझे खुदके इतना करीब आने दिया। पर फिर होश आया कि किस हक से तुमसे कहूँ ये सब, मैं थी ही कौन तुम्हारी।
मैंने अपने कदम पीछे लेने का फैसला कर दिया था, तुमसे हर मुनासिब दूरी बनाने का फैसला कर लिया था। पर सिर्फ मैं ही जानती हूँ, कितना मुश्किल था तुम्हारे सामने रहकर खुदको तुमसे प्यार करने से रोकना। कितना मुश्किल था जब तुम मुझे देखकर मुस्कुराते थे उस वक़्त अपने दिल को तेज धड़कने से रोकना । कितना मुश्किल था जब तुम मेरा हाथ पकड़ते थे और मेरा खुदको ये चाहने से रोकना कि ये हाथ तुम हमेशा के लिए थाम लो, कितना मुश्किल था खुदको बेख्याली में तुम्हारा नाम किसी नोटबुक पर लिखने से रोकना, कितना मुश्किल था खुदको रात भर तुम्हे बिना पाए ही खो देने के दर्द में आंसू बहाने से रोकना और सबसे ज्यादा मुश्किल था तुम्हे शेफाली के आस पास भी देखना।
नफरत करना चाहती थी मैं तुमसे पर तुम्हे प्यार करने से भी खुदको रोक नहीं पा रही थी, कैसे अचानक से सिर्फ तुम्हारी दोस्त बन जाती?

उस दिन कॉलेज के बाद जब मैं तुम्हारी बाइक के पीछे बैठ ही रही थी कि शेफाली आ गई और उसने कहा "प्लीज अनिकेत आज मुझे घर ड्राप कर दो मुझे कहीं जाना है और मुझे लेट हो रही है" तुम कहते तो शायद मैं बर्दाश नहीं कर पाती इसलिए खुद ही उतर गई और तुमसे कहा कि मैं टेक्सी ले लूंगी,जिस तरह शेफाली तुम्हारे इतना करीब बैठी थी उसे देख पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था उस दिन जाना था जलन किस चिड़िया का नाम है घर आकर मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं फूट फूट के रोने लगी ।
रोना भी कभी कभी बहुत जरुरी हो जाता है आँखों के साथ मन भी कुछ साफ हो जाता है, मेरा मन भी कुछ हल्का महसूस कर रहा था फिर अचानक मुझे याद आया कि
जिस दिन का शेफाली ने जिक्र किया था कि वो तुम्हारे साथ फिल्म देखने फिर डिनर और लॉन्ग ड्राइव गई थी उस दिन तो तुम मेरे घर थे।
तो क्या शेफाली सब कुछ जूठ बोल रही थी?
मेरे अनिकेत,
इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई मुझसे मैंने यूँ ही शेफाली की बातो पर यकीन कर लिया, वो तो शक्ल से ही जूठी लग रही थी मैंने दूसरे दिन सुबह उठते ही शेफाली को फोन करके पार्क मिलने बुलाया और वही उसपे धावा बोल दिया और घमकी भी दी कि अबकी बार भी जूठ बोला तो सारे कॉलेज में क्या शहर में बदनामी करवा दूंगी। मजबूरन उसे सच बताना ही पड़ा कि जब वो कॉलेज में थी उसकी सारी फ्रेंड्स के बॉय फ्रेंड्स थे बस वो ही इस मामले में पीछे रह गई थी तो उसने अपने जूनियर यानि तुम्हे फसाया और सारे कॉलेज में ढिंढोरा पीट लिया की वो तुम्हारी गर्लफ्रेंड है और तुम्हे अपने आंसुओ से बेवकूफ बनाया की तुम किसी को सच ना बताओ की वो सिर्फ दोस्त है तुम्हारी और वो जब कॉलेज के साथ साथ शहर भी छोड़ के गई तो तुम्हे लगा की अब ये जूठ भी ख़त्म और तुम इस पूरे मामले को भूल ही गए।
मुझे फिर से तुम पर बहुत गुस्सा आया कि तुमने मुझे पूरा झमेला बताया क्यों नहीं, वैसे तो तुम्हे चुप करवाना मुश्किल हो जाता है पर जहाँ तुम्हे बोलना चाहिए वहां मुह नहीं खुलता तुम्हारा। फिजूल इतना नुकसान करवा दिया।
मैंने पापा से ली उनकी फेवरेट रफ़ी साहब के दर्द भरे गानो की cd सुन सुन के घस ली थी, रोज़ रात रो रो के आँखे सुजा ली थी और उसके बाद पता पड़ता है कि इतने दिन का ये बेवफाई का मातम बेकार था, शेफाली तो तुम्हारी गर्लफ्रेंड थी ही नहीं कभी।
मैं सीधा कॉलेज गई तुम्हारी खबर लेने पर शेफाली वहां मुझसे पहले ही पहुँच गई और तुम्हे सब कुछ बता दिया और तुम जान बूझ के खाली कमरे में छुप कर बैठ गए और जैसे ही मैंने तुमपर चिल्लाना शुरू किया तुमने अपना ट्रम्प कार्ड चल ही दिया।
तुम मेरे पास आये मेरा हाथ थामा और मेरी आँखों में आँखे डालकर कुछ देर यूँ ही देखते रहे आज फिर एक अरसे के बाद हम खामोश थे पर हमारी आँखों ने ढेर सारी बातें कर ली, तुमने कहा "बहुत परेशान कर दिया ना तुमको प्लीज मुझे माफ़ कर दो"
मैंने कहा "गलती इतनी बड़ी है तो सजा तो मिलेगी"
तुमने कहा "तुमारी हर सजा मंजूर है मुझे"
मैंने कहा "जिन्दगी भर इस सरफिरी को झेलना पड़ेगा"
तुमने कहा "इस सरफिरी का सर्फिरापन भी सर आँखों पर"
फिर तुम कुछ और कहने लगे और मैं गुस्सा हो गई और मैंने कहा "ये भी आँखों आँखों में ही कहोगे? मेरे कान कब से तरस रहे है"
और तुम समझ गए और तुमने पहली बार अपने मुह से कहा "I love you Sandhya" और मैं बस मुस्कुरा दी |

मेरे अनिकेत,
कॉलेज के उस दिन से लेकर आज तक हमारे प्यार ने कितने उतार चढाव देखे, तुम्हारा ऑस्ट्रेलिया जाकर पड़ने का सपना था और मैं चाहती थी कि तुम यहीं इंडिया में ही रहो, कितना लड़ी थी मैं तुमसे पर कितना प्यार से मना लिया था तुमने मुझे ।
फिर तुम आये तुम्हे अच्छी नोकरी भी मिल गई पर मेरे पापा हम दोनों की जाति अलग होने के कारन शादी के लिए नहीं माने, उन्हें मनाते मनाते थक गई थी मैं और मैंने कहा भी था तुमसे के भाग चलते है पर तुम नहीं माने तुम मुझे हमेशा खुश रखना चाहते थे और जानते थे की अपने परिवार को नाराज करके मैं तुम्हारे साथ ज्यादा दिन खुश नहीं रह पाऊँगी। तब भी तुम्ही ने संभाल लिया था सब कुछ |
मेरे पापा के कई बार तुम्हे बेइज्जत करके घर से निकालने के बाद भी तुमने हार नहीं मानी, कभी तुम नाराज नहीं हुए उनकी इस बेरुखी पर, उस दिन जब फिर पापा ने तुम्हारी बात सुने बिना ही तुम्हे चले जाने को कह दिया था मैं बहुत रोई थी और फिर भागकर शादी करने की जिद्द पर अड़ गई पर उस दिन भी तुम्ही ने मुझे समझाया की "तुम्हारे पापा तुमसे बहुत प्यार करते है इसलिए ही मेरा तुम्हारे लिए प्यार और सब्र का इम्तेहान ले रहे है यूँ दरवाजा बंद करते करते एक न एक दिन उन्हें अहसास हो जायेगा की "
और तुम सही भी थे एक दिन वो दरवाजा खुल ही गया हमारे प्यार के लिए |
तुमने हर कदम पर कितना साथ दिया मेरा कभी सोचा नहीं था की इतना बोलने वाले तुम इतने संजीदा भी होंगे इतनी समझदारी से हमारे प्यार के इस सफ़र को इतना हसीन बना दोगे।
मैं आज ये सब इसलिए कह रही हूँ अनिकेत की मैंने कभी तुम्हे अपने जज्बात शब्दों में जाहिर नहीं किये कभी तुमसे ये नहीं कहा की मैं तुम्हे पागलों की तरह चाहती हूँ, तुम्हारे बिना एक पल भी सजा लगती है मुझे, हर गुजरते दिन के साथ मेरा तुम्हारे लिए प्यार और सम्मान बढता ही जाता है तुम्हारे साथ ही मैंने रिश्तो को और गहराई से समझा है, तुम्हारे साथ ही मैंने जाना है के अपनों के साथ चलकर काँटों भरा रास्ता भी महकता चमन लगता है।
कल जब हमारी शादी हो जाएगी तब भी तुम यूँ ही मेरा हाथ थामे रखना और हम दोनों प्यार के इस सफ़र में नई नई मंजिलें पार करते रहेंगे ।


तुम्हारी,
संध्या