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Wednesday, 2 October 2013

रेत का आशियाना



तुम्हे याद है 

बरसात की वो शाम 
बादल भी बरस कर 
कुछ सुस्ता रहे थे
और हम तुम 
आँगन में बैठे 
चाय पी रहे थे

आँगन में रेत थी 
मरम्मत के लिए 
और तुम उसे देख 
बच्ची बन गई

तुमने मेरे हाथ पर 
रेत थपक थपक कर 
एक छोटा घर बनाया

और फिर उसे कुछ
तिनको, सूखी पत्तियों
और छोटे पत्थरों से

शिद्दत से सजाया

आज भी मैंने 
दिल के एक कोने में 
संभाल कर रखा है 
वो पहला आशियाना 
हमारे प्यार का….

Monday, 30 September 2013

फुर्सत के कुछ पल


आज कुछ पल खुद के साथ जो बिताये तो लगा,जैसे अब तक खुदसे अनजान थी मैं,बढ तो रहे थे कदम पर नहीं जानती थीकिसकी पहचान थी मैं,
अब जो कुछ पल रुकी तो अहसास हुआ,कहाँ  जाना था कहाँ से आई थी मैं,
पीछे मुड़कर उन रास्तो को देखा तोकुछ ख़ुशी का अहसास हुआशायद इसलिए कि उन रास्तो पेकुछ यादें थी कुछ बीती बातें थीया शायद जो कुछ पाया थाउस पर नाज कर रही थी मैं,
एक पल को लगा बहुत आगे बढ चुकीअब कुछ आराम करूँ जो छुट चुकी हैजिन्दगी उसे नया आयाम दूँ,इन पलो में जो सिमट गई है जीवन की खुशियाँउन्हें ही मैं अपनी मंजिल बना दूँ,छोड़ दूँ ये गर्दिशो के रास्ते,इन यादों के इन बीती बातों केसहारे ही अपना जीवन बिता दूँ।
फिर लगा अरे! ये किस सोच में डूब गई मैं,ये ही तो इन्सान की फितरत हैजो पा लिया उसका शुक्र नहींजो नामुमकिन है उसी की चाहत है,फिर समझाया भी मन को,ये गुजरे पल गुजरे रहें तभी खुशियाँ देंगेइन्हें पा लिया तो फिर नई चाहत उठ जायेगी,
और फिर एक बार मैं चलने को तैयार हो उठीमन में उन यादों को समेट करएक ऐसे रस्ते पे जो न जाने कब ख़त्म हो।





Sunday, 15 September 2013

मेरी नन्ही परी

वो टिमटिमाती आँखें
जैसे सच्चाई का अक्स लिए,
वो निश्छल मुस्कान,
जैसे जन्नत की खूबसूरती खुद में समेटे,
वो मासूम चेहरा
जैसे निस्वार्थ, खुदा की नेमत बिखेरता,
बिलकुल ऐसा ही अनोखा रूप था
जब मेरी नन्ही परी इस दुनिया में आई थी …….

Wednesday, 11 September 2013

मेरी डायरी के वो कुछ पन्ने

मेरी डायरी के वो कुछ पन्ने 
जो तुम्हे समर्पित थे,
आज फिर जिन्दा हो गए,
यूँ तो मर चुके थे बहुत पहले ही,

डायरी के वो चंद पन्ने,
तुम कब के फाड़ चुके थे मेरी जिन्दगी से,
बस डायरी में छोड़ गए कुछ
चुबते टुकड़े अपनी यादों के,

वो टुकड़े तुम्हारी यादों के 
जो कभी नाजुक अहसास थे हमारे प्यार के,
अब खंजर बन रोज गढ़ते है सीने में,
और हर रोज़ कुछ जख्म कुरेद देते है
जो अब तक पड़े नासूर थे

 ये लम्हे अब सोंप रही हूँ तुम्हे ही,
भेज रही हूँ ये पन्ने खुरदरे तोहफे में,
जानती हूँ टुकड़े कर दोगे इनके भी मेरे दिल की तरह ही,
पर पढ लोगे शायद, इन्हें फाड़ने से पहले,

तब तुम जानोगे क्या था वो तुमने खो दिया आसानी से जो,
और अब मैं भी सुकून चुरा लुंगी, फाड़ के वो पन्ने 
जो कभी तुम्हे समर्पित थे।

Friday, 6 September 2013

कल्पना

चाहे थी वो एक कल्पना,पर बड़ी सुहानी थी वो कल्पना,
ना दुःख का था कोई साया बस खुशियों की शजर थी वो कल्पना,
हर तरफ सुख की खुशबू थी, बस फूलों सी महकती थी वो कल्पना,
हर जख्म से दूर हर दर्द से परे बस एक मलहम थी वो कल्पना,
हर मतलब से दूर हर बुराई से परे, बस एक अच्छाई थी वो कल्पना,
हर सुबह में ताजगी हर शाम में उम्मीद, हर रात सुकून भरी, कुछ ऐसी थी वो कल्पना।
चाहे सच्चाई से थी कोसों दूर पर मेरी ही परछाई थी वो कल्पना,
अब बस सोचती हूँ काश हकीकत भी कुछ वैसी ही होती,
जैसी थी वो कल्पना ……


Sunday, 25 August 2013

तुम में बहुत से तुम रहते हो.....

तुम में बहुत से तुम रहते हो,
कभी धुंधली शाम के चाँद जैसे,
कभी तडके की अलसाई अंगड़ाई जैसे,
कोई कोना है तुममे जो नाराज है पूरी दुनिया से,
कोई शख्स है तुमने हँसता है खुदाई जैसे।

Tuesday, 20 August 2013

जिसने थामा वहीँ ठहर गये.....

अपने ख्वाबों की लाशों पर से हम गुजरते चले गए,क्या बताएं क़िस्मत के हाथों हम कैसे बिखरते चले गए।


जिन्हें नसीब हो रहमत-ए-खुदा वो बदनसीबी क्या जाने,कोई पूछे उनसे जो एक कतरा मुस्कराहट के लिएआरजू-ए-समंदर निगल गए।

कैद थे कुछ जज्बात दिल के इक रोशन टुकड़े में,एक सर्द हवा जो आई तो वो पन्ने भी ठिठुर गये।

बहकता तूफान भी ढूंढ़ता है शांत सुनसान रस्ते,हम तो फिर भी इंसान थे जिसने थामा वहीँ ठहर गये।

Friday, 19 July 2013

बस यूँ ही...

आज पहली दफा एक दोस्त ने पूछा,
इतने ग़मगीन क्यों नजर आते हो?

मैंने एक ठंडी आह भरी,

और स्मृतियों से कोई एक मुक्कमल वजह
तलाशने की नाकाम कोशिश की,

फिर दिल में चुभे तीरों की ओर झांक कर
सबसे गहरे चुभे तीर को चुनने की कोशिश की,

फिर कुछ सोच कर,

न जाने कितने टूटे सपनो की चुभन
सहते सहते पीली पड़ गई आँखों को मसला,

ओर बेलब्ज ही सिल चुके होंठो पर,
बेजान जबान फेरते हुए कहा..

कुछ नहीं यार बस यूँ ही..... 

Thursday, 18 July 2013

उनकी मुस्कराहट....

मेरे दिल की गहराइयों कोछु जाती है उनकी मुस्कराहट,


मेरा हर अश्क पी जाती हैउनकी मुस्कराहट,

जिन्दगी का साथ हम कैसे छोड़ दें,हर रोज जीना सिखाती है उनकी मुस्कराहट,

शहद सी घुल के मेरे कानो मेंसुकून बन के छलक जाती है,

उनकी मुस्कराहट....



Wednesday, 17 July 2013

उडान

मुश्किलों के कोहरे को चीर कर,
अन्धेरों से रौशनी का कतरा छीन कर,
अपना मुकाम बनाना चाहती हूँ,
सितारों पे अपना नाम लिखना चाहती हूँ,
मैं एक ऊँची उडान भरना चाहती हूँ।

वक्त के जलजलो को मैंने भी देखा है,
काँटों की चुभन को मैंने भी सहा है,
कई मीलो का सफ़र है ये मैंने भी जाना है,
फिर भी अपने ख्वाबों को हकीकत मैं बदलना चाहती हूँ,
मैं एक ऊँची उडान भरना चाहती हूँ।

है मुमकिन कहीं हार जाऊं,
तुफानो की तेज हवाओं में बिखर जाऊं,
टूट जाये आस, छुट जाये मंजिलें,
पर वक्त के फैसले को मैं मोड़ना जानती हूँ,
मैं एक ऊँची उडान भरना चाहती हूँ।

Monday, 1 July 2013

जिन्दगी

सूरज तो तपता रहेगा
उसकी तपन नहीं
इक रौशनी की किरण से
जगमगा देना तुम अपनी जिन्दगी को,

चाँद से तुम रौशनी की आस न करना
उसकी शीतलता से भर देना
तुम अपनी जिन्दगी को,

फूलो में तो कांटे भी होते है
पर निराश न होना,
उनकी खुशबु से भर देना
तुम अपनी जिन्दगी को

तारो से न मिलेगा तुम्हे कुछ भी
उनकी तरह मुस्कराहट से भर देना
तुम अपनी जिन्दगी को

इक ठूंठ भी बहुत कुछ सिखा देता है हमे
उसकी तरह होसले से भर देना
तुम अपनी जिन्दगी को,

रेगिस्तान को देखकर तो घबरा जाओ तुम
पर तब भी, पर तब भी
इक बूंद की आस से भर लेना
तुम अपनी जिन्दगी को,

हर शय में ख़ुशी छुपी होती है,


इन खुशियों से भर देना तुम अपनी जिन्दगी को...

Sunday, 30 June 2013

होंसले के पंख


पंख है आसमान है उड़ने का सभी साजो सामान है,
फिर भी फासला है इतना लम्बा कि लगता है,
गिरना ही महज़ इस कोशिश का अंजाम है.....
पंखो के भरोसे तो कुछ मील उड़ लेंगे,
और कुछ किस्मत के सहारे....
पर बिन होसले के कितनी मंजिले पार कर पाएंगे?

Monday, 13 May 2013

मेरी अनमोल माँ।


मिट्टी की सोंधी खुशबु जैसी मेरी माँ,
भोली सी बच्चे की मुस्कान जैसी मेरी माँ,

उसके स्पर्श से गहरे से गहरा जख्म भी मुस्कराने लगे,
उसके आँचल में छुपकर डर भी दूर भागने लगे,
उसकी मीठी सी डांट, लगे जैसे शहद टपकती हो,
उसकी मार भी नींद की थपकी सी लगे,

कभी सतोलिया कभी घर घर खेलने वाली,
गुडिया जैसी मेरी माँ,
परियों की कहानियां सुनाने वाली,


खुद परी जैसी मेरी अनमोल माँ।

Friday, 10 May 2013

होड़

मैं घंटो तक सोचता रहा क्या है वो राज़,
जिससे निकल सकू मैं सबसे आगे,
जीत सकू पूरी दुनिया..
सब कुछ तो आजमा चुका अब क्या है,
जिससे अनजान हूँ मैं?
पहले था सबसे पीछे तो बस,
भीड़ को चीर कर आगे बढने की होड़ थी,
आज आगे हूँ सब पीछे छोड़
फिर भी भाग रहा हूँ.... जाने किस होड़ में?
भागते भागते न जाने कितना दूर आ गया,
और न जाने क्या और कितना पीछे छोड़,
पर अंततः इतना तो जान ही लिया कि,
जो बाकी था वो था किसी अपने का साथ,
इसलिए वही रुक गया,
उस हाथ के इन्तेजार में जिसे
थाम फिर नई दिशा में कदम बड़ा सकू....